
काँच के टूटने से बचना: रहस्य है 0.1°C में
क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है कि प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले काँच के बर्तन अचानक ही टूट जाएँ? यह बहुत ही खराब स्थिति है… आपने घंटों की मेहनत की है, लेकिन थोड़ा सा आंतरिक दबाव ही सब कुछ बर्बाद कर देता है।
इस समस्या का कारण आमतौर पर काँच के ठंडा होने की प्रक्रिया है। यदि काँच सही तरीके से ठंडा न हो, तो उसमें दबाव बना रहता है… और अंत में काँच टूट जाता है। इसे रोकने हेतु हम इन्फ्रारेड ऊष्मा एवं चमकदार एल्यूमिनियम रिफ्लेक्टरों का उपयोग करते हैं।
0.1°C क्यों महत्वपूर्ण है?
ज्यादातर हीटर बहुत ही असटीक होते हैं… वे बहुत ऊपर-नीचे हो जाते हैं। लेकिन काँच को सही तरीके से ठंडा करने हेतु ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जो 0.1°C की सटीकता से काम करे।
हम तेज़ प्रतिक्रिया वाले इन्फ्रारेड उत्सर्जकों एवं उच्च-आवृत्ति वाले PID नियंत्रकों का उपयोग करते हैं। इन्फ्रारेड ऊष्मा का फायदा यह है कि यह काँच के आसपास की हवा को गर्म नहीं करती… बल्कि सीधे ही काँच पर ही प्रभाव डालती है।
रिफ्लेक्टरों का महत्व
अकेले इन्फ्रारेड लैंप से तो कोई फायदा नहीं होता… आधी ऊष्मा तो कमरे में ही खो जाती है। इसीलिए हम चमकदार एल्यूमिनियम रिफ्लेक्टरों का उपयोग करते हैं… ये ऊष्मा को वापस काँच पर ही भेजते हैं। इससे काँच के हर हिस्से पर समान ऊष्मा पहुँचती है… बिना रिफ्लेक्टरों के काँच के कुछ हिस्से ठंडे रह जाते हैं… और यहीं से ही दरारें शुरू होती हैं।
ध्यान रखने योग्य बातें
ये सभी उपकरण “प्लग-एंड-प्ले” वाले नहीं हैं… यदि आपका पावर सप्लाई अस्थिर है, तो काँच का तापमान अचानक ही बदल जाएगा। चीजों को स्थिर रखने हेतु आपको एक विशेष स्टेबिलाइजर या उच्च-गुणवत्ता वाला SCR पावर कंट्रोलर आवश्यक है… यह वोल्टेज को स्थिर रखता है।
ऐसे उपकरण तो उन्हीं प्रयोगशालाओं में ही उपयोग में आते हैं, जहाँ एक टूटा हुआ बर्तन ही हीटर की कीमत से अधिक होता है… ऐसे उपकरणों से ऊष्मा तेज़ी से ही काँच तक पहुँचती है।
बस एक सलाह… रिफ्लेक्टरों को हमेशा साफ रखें… थोड़ी सी धूल ही उनकी प्रभावकारिता को कम कर देती है… और पूरी ऊष्मा-व्यवस्था बिगड़ जाती है।